श्वास जीवन है।
विश्व भर में जीव श्वास से ऊर्जा प्राप्त करता है। श्वास है हम जीवित है। योग प्राणायाम के माध्यम से हम प्राण की योग्यता का विकास करने का अभ्यास करते है। शरीर में दस प्राण होते है। और इसी कारण बाहरी जगत में दस दिशाएं है। और इन सभी दिशाओं की देवी दस महाविद्या है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!मुख्य प्राण है= प्राण अपान उदान व्यान समान।
उपप्राण है नाग देवदत्त कूर्मा धनन्जय कृंकल 
प्रतिदिन योग प्राणायाम का अभ्यास जीवन शक्ति को मजबूत करता है। व्यायाम और प्राणायाम के अभ्यास से प्राण को अधिक बल मिलता है। भस्त्रिका नाड़ी शोधन उज्जायी कुंभक आदि से यह संभव है।
अपान प्राण= नाभि से पैरों तक प्रभावित करता है। पेट के निचले भाग गुर्दे, मूत्र टांगों सभी अपान प्राण से क्रिया करते है। नौलि, अग्निसार अश्विनि मुद्रा मूल-बन्ध का अभ्यास अपान प्राण को वलबान और शुद्ध करने की क्रिया है।
व्यान= नाड़ी मार्ग से कार्य करता है। प्रभाव तन और नाडिय़ों पर होता है। इसकी कमी से रक्त-प्रवाह नाड़ी में खराबी होती है।
व्यान कुंभक के अभ्यास से सक्रिय होता है प्राणायाम के अभ्यास से यह ठहराव लम्बा हो जाता है।
उदान प्राण= उच्च ऊर्जा है। जो हृदय से सिर में कार्य करती है।
इसके नियन्त्रण से शरीर बहुत हल्का हो जाता है। और हवा में उठ जाने की क्षमता आती है। उज्जायी भ्रामरी प्राणायाम विपरीत करणी मुद्रा से भी उदान प्राण सक्रिय हो जाता है।
समान= मुख्य प्राण है। यह अनाहत एवं मणिपुर चको जोड़ता है।
समान प्राण आहार की ऊर्जाशरीर में देता है।
यह प्राण अग्निसार नौलि से बलवान होता क्रिया योग का अभ्यास पूरे शरीर को गरम करता है।
उपप्राण=
नाग= डकारना
यह प्राण अपान के मध्य रुकावटों को दूर करता है।
कूर्मा= पलक झपकना
यह आंखों के क्षेत्र में क्रिया है, जिससे पलकों के खुलने और बन्द होने का कार्य नि होता है। ॐ के जप और त्राटक के अभ्यास से कूर्मा सन्तुलन होता है।
देवदत्त=जम्हाई लेना
यह क्रिया समान प्राण क्रिया है। जम्हाई से गैस बाहर निकाल देती है। भोजन के बाद थकान को दूर करती है।
कृंकल =छींकना
श्वास-तन्त्र की रुकावटों को दूर करता है।
धनन्जय -=हृदय का खुलना व बन्द होना
धनन्जय हृदय के निकट है। यह पूरे तन शरीर को प्रभावित करता है। और मृत्यु के बाद यही प्राण सक्रिय रहता है। जीवात्मा के समस्त कर्म और संस्कार इसी प्राण में जमा हो जाते है। बाकी के सभी प्राण नष्ट हो जाते ह।
यही है जिसे हम ध्यान में खोजते हैं। और प्रश्न करते हैं। में कौन हूं।

