गायत्री उपासना कभी भी निष्फल नहीं होती , गायत्री महा विज्ञान।।

आप गायत्री उपासना करते है तो उसे बढ़ाइए, नही करते है तो आरंभ कीजिए । उसका परिणाम शुभ ही होगा।

शास्त्रोक्त विधि विधान पूर्वक की गई उपासना कभी भी निष्फल नहीं होती। उससे मानसिक शांति का निश्चित रूप से सत परिणाम प्राप्त होते है ।
संसार में जितनी भी सुख संपतिया है, उस सर्व शक्तिमान सत्ता के हाथ में है । वही उसकी स्वामिनी है । जब उस परब्रह्म से मनुष्य अपना सम्बंध स्थापित कर लेता है और उसकी कृपा का अधिकारी बन जाता हैं तो उसे अपने इष्ट देव के अधिकार की कोई भी वस्तु प्राप्त कर लेना कठिन नही रहता। जो राजा का कृपा पात्र हैं उसे उस राज्य की कोई भी वस्तु मिल सकती हैं । जिन असुविधाओं को राजा दूर कर सकता है उनसे भी वह राज कृपा पात्र, छुटकारा पा सकता है । इसी प्रकार उस परब्रह्म की कृपा को जो लोग प्राप्त कर लेते है उनके लिए इस विश्व का प्रत्येक पदार्थ प्रत्येक सुख, करतल गत हो जाता है। उनके लिए कोई भी एवं त्रास  शेष नहीं रहता ।

गायत्री महा मंत्र ईश्वरीय कृपापात्र बनने का सर्वोत्तम साधन है । इस मंत्र में बताई हुई शिक्षाओं को अपने जीवन में ढाल देने वाला  गायत्री के 24अक्षरों में बताए हुए सिद्धांतो , आदर्शो, दृष्टिकोणों एवम कृतव्यो को हृदयगम करने वाला मनुष्य प्रभु को अत्यंत प्रिय होता है। जो भक्ति  का परिचय दे वही भक्त है। भक्ति का एक मात्र लक्षण ईश्वर की आज्ञाओं का पालन, उसके बताए हुए मार्ग पर चलना है । जो लोग हर घड़ी ईश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं, ऐसे लोग केवल पूजा पाठ से ईश्वर के भक्त नहीं बन सकते और न प्रभु का अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं, जिन्हें अनेकों उलझनो कठिनाइयां भयो अभावो तथा अनिष्टो से छुटकारा पाना है वे गायत्री माता के बताए मार्ग पर चले, अपने विचारो को धर्मानुकूल एवम सात्विक बनावे। सच्चे गायत्री उपासकों की मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण ही होती है । 

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गायत्री मन्त्र क्यों सिद्ध नहीं होते ?

माधवाचार्य गायत्री के घोर  उपासक थे वृंदावन में उन्होंने 13 वर्ष तक गायत्री की उपासना  और समस्त अनुष्ठान विधिपूर्वक किये। लेकिन उन्हें इससे न भौतिक न आध्यात्मिक लाभ दिखा वह निराश होकर काशी आ गए वहां उन्हें एक अवधूत मिला जिसने उन्हें एक वर्ष तक काल भैरव की उपासना करने को कहा उन्होंने एक वर्ष से अधिक काल भैरव की आराधना की , एक दिन उन्होंने आवाज सुनी मैं प्रसन्न हूं वरदान मांगो,

उन्हें लगा कि यह उनका भ्रम है  क्योंकि सिर्फ आवाज सुनाई दे रही थी कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
उन्होंने सुना अनसुना कर दिया , लेकिन वही आवाज उन्हें तीन बार सुनाई दी ।
तब माधवाचार्य ने कहा आप सामने आकर अपना परिचय दें मैं अभी काल भैरव की उपासना में व्यस्त हूं ।
सामने से आवाज आई तू जिसकी उपासना कर रहा है मैं वही काल भैरव हूं , माधवाचार्यजी ने कहा तो फिर सामने क्यों नहीं आती काल भैरव जीने कहा _ माधव ! तुमने 13 वर्ष तक जिन गायत्री मित्रों का अखंड जाप किया है उसका तेज तुम्हारे सर्वत्र चारों ओर व्याप्त है मनुष्य रूप में उसे मैं सहन नहीं कर सकता, इसलिए सामने नहीं आ सकता हूं माधवाचार्य ने कहा जब आप उस तेज का सामना नहीं कर सकते हैं तब आप मेरे किसी काम के नहीं आप वापस जा सकते हैं ।
 लेकिन मैं तुम्हारा समाधान किए बिना नहीं जा सकता हूं।
तब फिर यह बताइए की मैंने पिछले 13 वर्षों से किया गायत्री अनुष्ठान का फल क्यों नहीं मिला ?
काल भैरव ने कहा_ वह अनुष्ठान निष्फल नहीं हुए हैं तुम्हारे जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हुए हैं ।
तो  अब मैं क्या करूं 
फिर से वृंदावन जाओ और एक वर्ष का अनुष्ठान करो 
इससे तेरे इस जन्म के पाप नष्ट हो जाएंगे फिर गायत्री मां प्रसन्न होगी ।
माधवाचार्य वृंदावन लौट आए अनुष्ठान शुरू किया एक दिन ब्रह्म मुहूर्त अनुष्ठान में बैठने ही वाले थे उन्होंने आवाज सुनी मैं आ गई माधव वरदान मांगो,,,
मां,,, माधवाचार्य फूट-फूट कर रोने लगे मां पहले बहुत लालसा थी की वरदान मांगू लेकिन ?? अब कुछ मांगने की इच्छा रही नहीं , मां, आप जो मिल गई हो
माधव !! तुम्हें मांगना ही पड़ेगा , 
मा ये शरीर भले ही नष्ट हो जाए लेकिन इस शरीर से की गई भक्ति अमर रहे । इस भक्ति की आप सदैव साक्षी रहो । यही वरदान दो 
तथास्तु ,,, 
आगे 3 वर्षों में माधवाचार्य जी ने (माधवनियम) नाम का अलौकिक ग्रंथ लिखा 
याद रखिए,,,, आपके द्वारा शुरू किए गए मंत्र जाप पहले दिन से ही काम करना शुरू कर देते हैं ।
लेकिन ??? सबसे पहले प्रारब्ध के पापों को नष्ट करते हैं । देवताओं की शक्ति इन्हीं पापों को नष्ट करने में खर्च हो जाती है और जैसे ही यह पाप नष्ट होते हैं आपको एक अलौकिक तेज एक आध्यात्मिक शक्ति और सिद्धि प्राप्त होने लगती है ।

गायत्री महाविज्ञान 

 
 
 
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