भारतभूमि से ईसामसीह का अनन्य सम्बन्ध

ईसा प्रेम की जगमगाती प्रतिमा

ईसा प्रेम की जगमगाती प्रतिमा है। यह प्रतिमा हमारे दिलों में बसती है, भावों में बहती है और विचारों में उभरती है। ईसा की भाषा प्रेम की भाषा है, जो सीधे दिल में उतर जाती है। ऐसी प्रेमपूर्ण भाषा जो चुकती नहीं है, जितना बोलो, बोलने को बाकी रह जाता है। इसी बाकी में से संपूर्णता की प्राप्ति की जा सकती है। इसलिए ईसा प्रेम को परमात्मा कहते हैं। वह कहते हैं, प्रेम का अर्थ है- भरोसा; प्रेम का अर्थ है- श्रद्धा; प्रेम का अर्थ है- स्वीकार्यता; प्रेम का अर्थ है- द्वार खुले हैं और यह खुलापन अनंत आकाश को सहचर बनाता है। प्रेम में दूरियाँ कम हो जाती हैं, भ्रांतियाँ मिट जाती हैं, भ्रम तिरोहित हो जाता है और इसी प्रेम में परमात्मा की झलक-झाँकी मिलती है। ईसा सभी को यह दिव्य झाँकी दिखाना चाहते हैं।

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ईसा का प्रेम उस सुंदर-सुरभित गुलाब के पुष्प के समान है, जो काँटों के बीच मुस्कराता है। ईसा का प्रेम कठोर तप की ऊष्मा का परिणाम है। इतिहासकारों की बात मानें तो ईसा के जीवन का बेशकीमती एवं महत्त्वपूर्ण भाग धरती के रमणीक स्वर्ग कहे जाने वाले हिमालय की सुरम्य घाटी कश्मीर में व्यतीत हुआ। यहीं पर उन्होंने दीर्घकाल तक तपस्या की और इस तप से प्राप्त ज्ञान को जनमानस में प्रकाशित किया। ईसामसीह और भारत के बीच गहरा संबंध रहा है। इतिहासकार उन्हें हिंदुस्तान का सपूत कहते हैं; क्योंकि यहीं आकर उन्होंने जीवन का लक्ष्य प्राप्त किया और इस बोध को अभिव्यक्त किया।

ईसा के जीवन का अज्ञातकाल

ईसा के जीवन के अज्ञात काल की खोज में अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले म्यूनिख, जर्मनी के सुविख्यात धर्मशास्त्री रॉबर्ट क्लाइट ने स्पष्ट किया है कि बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट में ईसा के जीवन का १३ से ३० वर्ष की अवस्था का वर्णन रिक्त है। क्लाइट के अनुसार इस तेरह वर्ष की अवस्था में उन्होंने भारत की ओर प्रस्थान किया था तथा उनतीस वर्ष तक यहाँ रहकर ब्राह्मणों और बौद्धों से धार्मिक ज्ञान प्राप्त किया था। ईसा वेद एवं उपनिषद् के गंभीर ज्ञान से चमत्कृत एवं आश्चर्य- जनक ढंग से प्रभावित हुए थे। इसके पश्चात उन्होंने नेपाल में जाकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया तथा तंत्र साधनाएँ सीखीं। तीसवें वर्ष में इजराइल वापस लौट गए और यहाँ से प्राप्त ज्ञान एवं अनुभव का वहाँ प्रचार किया। क्लाइट ने स्पष्ट किया कि इन शिक्षाओं का संग्रह करके उनके शिष्य मैथ्यू, मार्क, ल्यूक और जॉन आदि ने उन्हें लिपिबद्ध किया, जो न्यू टेस्टामेंट में वर्णित हैं।

ईसामसीह के गुप्त जीवन के अनुसंधान की कड़ी में दसवीं शताब्दी के प्रख्यात इतिहासवेत्ता शैक-अल- सईद-अस सादिक भी शामिल हैं। सादिक ने अपनी ऐतिहासिक कृति ‘इकमाल-उद्-दीन’ में उल्लेख किया है कि ईसामसीह ने एक बार नहीं, बल्कि दो बार भारत की यात्राएँ की हैं। पहली बार वे १२-१३ वर्ष की उम्र में भारत आए और यहाँ लगभग १६ वर्ष तक रहे। इन १६ वर्षों में उन्होंने जिन तांत्रिक साधनाओं का अभ्यास किया, उन्हीं के प्रभाव से सूली पर चढ़ाए जाने के बावजूद वे पुनर्जीवित हो गए। तत्पश्चात वे ‘युज-आशफ’ के नाम से दीर्घ काल तक कश्मीर में रहे और यहीं पर उन्होंने अपनी देह का त्याग किया था। विश्वविख्यात मनीषी मैक्समूलर ने भी ‘इकमाल-उद्-दीन’ का जर्मन में अनुवाद किया और इसे प्रकाशित कराया।

कश्मीर के सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता प्रोफेसर फिदाहुसैन ने भी इस संदर्भ में गहन अनुसंधान किया है। उन्होंने अपनी कृति ‘फिफ्थ गॉस्पल’ में तथ्यपूर्ण ढंग से प्रतिपादित किया है कि बचपन में ईसा ने भारत आकर हिंदू एवं बौद्ध धर्मों का अध्ययन किया था, अनेक तीर्थस्थानों की यात्राएँ की थीं तथा लद्दाख एवं कश्मीर घाटी में कठोर साधनाएँ की थीं। हुसैन ने उस कृति में उल्लेख किया है कि दूसरी बार वे क्रूसारोहण के बाद यहाँ आए और अपना नाम बदलकर मृत्युपर्यंत यहीं रहे।

गायत्री उपासना कभी भी निष्फल नहीं होती , गायत्री महा विज्ञान।।

ईसा के समकालीन प्रथम सदी के एक रोमन विद्वान ने भी इस तथ्य का समर्थन किया है कि ईसा का अज्ञात जीवन हिमालय की गुफाओं में तपस्या करते हुए व्यतीत हुआ। इस संदर्भ में रूस के प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता निकोलाय अलेक्सांद्रोविच नोतोविच लगातार चालीस वर्षों तक यही तथ्य जुटाते रहे कि ईसा अपने अज्ञातवास में कहाँ रहे? सन् १८८७ में अपनी भारतयात्रा के समय उन्होंने लद्दाख एवं तिब्बत की राजधानी ल्हासा की यात्रा की। ल्हासा के सबसे बड़े बौद्ध मठ ‘हेमिस’ में उन्हें ताड़ पत्र पर पाली भाषा में लिपिबद्ध दुर्लभ ग्रंथ पढ़ने को मिले। इसके बारे में उन्होंने अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति ‘दि अननोन लाइफ ऑफ दि जीसस क्राइस्ट’ में विवरण दिया है कि ईसा १३-१४ वर्ष की उम्र में कुछ व्यापारियों के संग भारत के सिंध प्रांत में पहुँचे और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने तक बौद्ध शिक्षाओं का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने पाँच नदियों के प्रांत ‘पंजाब’ की यात्रा की और वहाँ कुछ दिन जैन संतों के साथ गुजारे।

नोतोविच ने आगे स्पष्ट किया कि ईसा ने पंजाब के बाद जगन्नाथ पुरी (उड़िसा) में छह वर्ष व्यतीत किए। यहाँ उन्होंने वेद, उपनिषद् एवं मनुस्मृति का अध्ययन किया और अपनी भाषा में उनका अनुवाद किया। यहीं पिछड़ी जातियों के उद्धार के लिए उन्हें सत्कर्म करने की प्रेरणा मिली। इसके पश्चात वे पुरी से राजगिरी, बनारस तथा अन्य कई पवित्र तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए हिमालय चले गए। यात्रा करते हुए वे नेपाल भी पहुँचे और वहाँ वे छह वर्ष तक रहकर बौद्धग्रंथों का अध्ययन करते रहे, फिर वे वहाँ से जगह-जगह उपदेश देते हुए पश्चिम की ओर चले गए और अंततः पर्शिया होते हुए फिलिस्तीन, इजराइल पहुँचे।

तिब्बत की राजधानी ल्हासा के बौद्धमठ ‘हेमिस’ में रखी उन पांडुलिपियों का अध्ययन करने के लिए रूसी इतिहासवेत्ता नोतोविच के अलावा एक अन्य विद्वान निकोलस रोरिख सन् १९२५ में तिब्बत आए थे। रोरिख ने इन तथ्यों को अपनी कृति ‘दि हार्ट ऑफ एशिया’ में उल्लेख किया है कि ईसा का अज्ञातवास स्थल भारत था। अमेरिकी विद्वान लेबी ने भी अपनी पुस्तक ‘दि एक्वेरियन गॉस्पल ऑफ जीसस क्राइस्ट’ के छठे एवं सातवें भाग में ईसा की दो बार की भारतयात्रा का वर्णन किया है। सन् १९२२ में रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी अभेदानंद ‘हेमिस मठ’ में गए और इन तथ्यों का बाँग्ला भाषा में अनुवाद किया, जो ‘कश्मीरी ओ-तिब्बती’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई थी। डॉक्टर स्पेंसर ने अपने ग्रंथ ‘मिस्टीकल लाइफ ऑफ जीसस’ में ऐसे तमाम अकाट्य प्रमाणों का संग्रह करके उल्लेख किया है कि ईसा का भारत आगमन उनके जीवन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना थी।

स्पेंसर के अनुसार

   स्पेंसर के अनुसार- भारत में धर्म का उद्भव हुआ, अध्यात्म का प्रसार हुआ। भारतभूमि धर्म एवं अध्यात्म की दिव्य भूमि है। इसके संपर्क में आते ही ईसा का हृदय भावपूरित हो गया था और स्वतः स्फूर्त वे तपस्या में निरत हो गए। इस धरती में बौद्ध को बोध हुआ था। महावीर भी निर्वाण को उपलब्ध हुए थे। ठीक इसी प्रकार ईसा भी इसी दिव्य भारतभूमि में अपने जीवन की सचाई का साक्षात्कार कर पाए। वे हिमालय की एक दिव्य आत्मा थे और ईश्वर का संदेश लेकर अन्याय, अत्याचार को मिटाने के लिए आए हुए थे। उनका भारत की दिव्य भूमि व भगवान बुद्ध से गहरा संबंध था, जिसके कारण वे यहाँ पर आने के लिए आकर्षित हुए। https://www.youtube.com/@allvedant

इतिहासकारो के अनुसार 

  इतिहासकारों के अनुसार – भारत से ज्ञान प्राप्त कर रविवार को यीशु ने येरुशलम में प्रवेश किया। इस दिव्य दिन को ‘पाम संडे’ कहते हैं। शुक्रवार को उन्हें सूली दी गई थी, अतः इसे ‘गुड फ्राइडे’ कहा जाता है। तीन दिन बाद रविवार के दिन ‘मेरी मेग्दलेन’ ने उन्हें उनकी कब्र के पास जीवित देखा। इस घटना को ‘ईस्टर’ के रूप में मनाया जाता है। इसके बाद ईसा यहूदी राज्य में कभी भी नजर नहीं आए। वे अपने योगबल से भारत आकर तपस्या करने लगे। उन्होंने मानवता के कल्याण के लिए क्रूसारोहण को स्वीकार किया था। वे मानवता के लिए जिए और उन्होंने मानवता के लिए देह त्याग की। भारत- भूमि इसकी साक्षी है; क्योंकि उन्होंने यहीं ज्ञान प्राप्त किया और यहीं अंतिम साँस ली।
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