योग किसे कहते है ?

‘योग’ एक अत्यंत प्राचीन और गहन भारतीय ज्ञान परंपरा का अंग है। संस्कृत शब्द ‘योग’ का अर्थ है – ‘जोड़ना’, ‘मिलना’ या ‘एकता’। योग केवल शरीर के व्यायाम का नाम नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन, आत्मा और ब्रह्मांड के बीच सामंजस्य स्थापित करने की एक प्रणाली है। योग का उद्देश्य है व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराना और उसे परम सत्य के साथ एकात्म करना।

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योग का अर्थ और परिभाषा

योग का शाब्दिक अर्थ है “संयम” और “समाधि”। महर्षि पतंजलि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘योगसूत्र’ में योग की परिभाषा दी है –
“योगः चित्तवृत्ति निरोधः”
अर्थात्, चित्त की वृत्तियों का निरोध (रोकना या नियंत्रण) ही योग है। जब मन स्थिर और शांत हो जाता है, तब साधक अपने आत्मस्वरूप का अनुभव कर सकता है।

योग के मुख्य अंग

पतंजलि के अनुसार योग के आठ अंग हैं, जिन्हें “अष्टांग योग” कहा जाता है:

  1. यम (नियमित सामाजिक आचरण)

  2. नियम (व्यक्तिगत शुद्धि और नियम)

  3. आसन (शारीरिक स्थिरता)

  4. प्राणायाम (श्वास का नियंत्रण)

  5. प्रत्याहार (इन्द्रियों का संयम)

  6. धारण (चेतना का एकाग्रकरण)

  7. ध्यान (गहन ध्यान)

  8. समाधि (आत्मा का ब्रह्म में लय) https://www.youtube.com/@allvedant

    प्राचीन ऋषि मुनि वैज्ञानिक थे जिन्होंने अनेकों अविष्कार किया।

इन आठों अंगों का अभ्यास साधक को आंतरिक शांति, स्वास्थ्य, और अंतिम मुक्ति (कैवल्य) की ओर ले जाता है।

योग के प्रकार

योग की अनेक विधाएँ हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  • राजयोग: मन पर नियंत्रण के माध्यम से मुक्ति प्राप्त करना।

  • भक्तियोग: भक्ति और प्रेम के माध्यम से ईश्वर से एकता साधना।

  • ज्ञानयोग: ज्ञान और विवेक के द्वारा आत्मा का साक्षात्कार करना।

  • कर्मयोग: निष्काम कर्म के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति करना।

  • हठयोग: शरीर और प्राण पर नियंत्रण द्वारा आत्मसिद्धि प्राप्त करना।

आधुनिक संदर्भ में योग

आज के समय में योग का अभ्यास मुख्यतः शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, और तनावमुक्ति के लिए किया जाता है। नियमित योगाभ्यास से शरीर में लचीलापन बढ़ता है, प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है, और मन स्थिर होता है। विश्व भर में योग को स्वास्थ्यवर्धक जीवनशैली के एक आवश्यक साधन के रूप में अपनाया जा रहा है। 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ भी मनाया जाता है।

निष्कर्ष

योग केवल आसन और प्राणायाम का अभ्यास नहीं है, बल्कि यह एक सम्पूर्ण जीवन शैली है, जो हमें आंतरिक शांति, संतुलन और आत्मबोध की ओर ले जाती है। यह शरीर, मन और आत्मा के बीच की दूरी को मिटाकर हमें संपूर्णता का अनुभव कराता है।

जैसा कि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है:
“योगः कर्मसु कौशलम्”
योग जीवन के प्रत्येक कार्य में कुशलता लाने की कला भी है।

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